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अजय शर्मा

कल्पना करे कि आप किसी ट्रेन में बैठे हैं, प्लेटफॉर्म को इसने पहियों पर चलते हुए पार किया लेकिन धीरे में यह ज़मीन से छह इंच ऊपर उठ गई - और तैरने लगी अपने गंतव्य की ओर, तीन सौ मील प्रति घंटे ( 183 किमी प्रति घटा) की स्पीड से। कल्पना सी लगने वाली यह बात अब साकार भी हो जाएगी, बस देर इतनी सी है कि कोई वैज्ञानिक ऐसा पदार्थ खोज ले जो सामान्य तापमान पर ही 'अतिचालकता' प्रदर्शित करने लगे। अतिचालकता, मतलब कि जब पदार्थ का विद्युत प्रतिरोधी गुण समाप्त हो जाता है और उसमें मे होकर करंट बिना किसी नुकसान के बहता ही रहता है। इसी गुण को ध्यान में रख कर तैयार किया गया ऐसी ही एक ट्रेन का स्केच। इसमें लगे अतिचालक चुंबकों की मदद से यह ज़मीन से छह इंच ऊपर उठेगी और इन चुंबको द्वारा तैयार किए गए चुंबकीय क्षेत्र की मदद से तैर चलेगी आगे की ओर।

यह तो आप मानेंगे कि हमारा रोज़मर्रा का अनुभव प्रकृति के एक सीमित दायरे और चंद आयामों से ही हमें वाकिफ करवा पाता है। इसलिए जब कभी भी हम वैज्ञानिक उपकरणों और सिद्धांतों के ज़रिए अपने सीमित दायरे से परे तांक-झांक कर पाते हैं, तो प्रकृति की एक अलग ही तस्वीर नज़र आती है। सी तस्वीर जो न सिर्फ अपने-आप में अनूठी होती है, बल्कि ढेरों अनसोची, अनदेखी संभावनाओं से भी हमें मुखातिब करवा जाती है। प्रकृति की इन्हीं तस्वीरों को खोजने, और उनमें छिपी संभावनाओं को यथार्थ में बदल कर दुनिया का काया कल्प करने की कोशिशों में हमारे वैज्ञानिक बंधु जुटे रहते हैं। भौतिक विज्ञान में ऐसी ही एक ज़ोरदार कोशिश आजकल अतिचालकता (super con ductivity) के क्षेत्र में चल रही है।

शोध का यह क्षेत्र पदार्थों के एक ऐसे अनोखे विद्युतीय गुण से ताल्लुक रखता है जो प्रकृति में शायद ही कहीं (कम-से-कम पृथ्वी पर तो नहीं ) स्वतः उजागर होता हो। यह इसलिए कि पदार्थ अपने इस अनोखेपन को ऐसी खास परिस्थितियों में ही प्रदर्शित करते हैं, जो फिलहाल प्रयोगशालाओं में ही पैदा की जा सकती हैं। आज दुनिया भर की प्रयोगशालाएं ऐसे पदार्थों को ढूंढने में जुटी हैं जो इस गुण को साधारण (या थोड़ी कम विषम ) परिस्थितियों में भी प्रदर्शित कर पाएं। यह खोज मात्र वैज्ञानिक कौतुहल से ही प्रेरित नहीं है। इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम दर्ज कराने की ललक और बेशुमार दौलत की चार भी इन प्रयोगशालाओं को इस विषय पर शोध करने के लिए मजबूर कर रही है। इस दौड़ में जो सफल हो गया, उसके वारे-न्यारे निश्चित है। जी हां, इस गुण से जुड़ी संभावनाएं हीं ऐसी ज़बरदस्त कि अगर व्यवसायिक तौर पर साकार हो जाते हैं तो हमारे जीवन का कायाक निश्चित है।

फर्ज़ कीजिए कि भारतीय रेल ऐसी रेलगाड़ियां दौड़ा पाए जो बिन पहिये के ज़मीन से मात्र 8 मि.मी. की ऊंचाई पर, हवा में तैरते हुए 500 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से आपको भोपल से दिल्ली मात्र डेढ़-दो घंटों में पहुंचा दे। कल्पना कीजिए एक ऐसी कार जो निर्वात (evacuated) सुरंगों में से साढ़े तीन हज़ार किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से बेआवाज़ तैरते हुए आपको काश्मीर से कन्याकुमारी तक मिनटों में ही पहुंचा दे, और वह सिर्फ एक लीटर पेट्रोल (प्रति यात्रा) जितनी ऊर्जा खर्च करके। या एक ऐसे परिपथ के बारे में जिसे करंट बिना कोई वोल्टेज के स्वतः ही चिरकाल तक बहता रहे। नहीं, वैज्ञानिक गल्प कथाओं की बात कर रहा हूं। जमीन से मात्र कुछ मि. मी. उठ कर हवा में तैरने वाली ट्रेनें अब


* इस कार को निर्वात सुरंग में 3500 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तैरा कर ज़रूर नहीं गया है, पर निकट भविष्य में ऐसा हो पाएगा इसकी उम्मीद की जा सकती है।


जर्मनी और जापान में मौजूद हैं। हवा में तैरने वाली कार को प्रयोगशाला में बनाकर देखा जा चुका है। और वाशिंगटन, अमेरिका में एक ऐसा विद्युत परिपथ मौजूद है जिसमें सैकड़ों एम्पीयर करंट बिना वोल्टेज के, और बिना क्षीण हुए पिछले कई सालों से लगातार बह रहा है। तो फिर अतिचालकता आधारित उपकरणों और मशीनों ने हमारे जीवन में प्रवेश क्यों नहीं किया है? हवा में तैरती ट्रेनें हमें नज़र क्यों नहीं आतीं? दरअसल, यह देरी कोई असामान्य बात नहीं है। प्रयोगशाला में हुई कोई भी ईजाद के आम जीवन में उतरने से पहले व्यवसायिक निर्माता और विक्रेता के लिए पर्याप्त मुनाफे की गुंजाइश होनी चाहिए। माइकल फैराडे ने विद्युत जनरेटर का सिद्धांत सन् 1831 में ही खोज लिया था, पर प्रथम बिजली घर पचास सालों के लंबे इंतजार के बाद 1881 में ही बन पाया था। आज अतिचालकता आधारित उपकरणों के साथ भी लगभग यही परिस्थिति है।

अतिचालकता आखिर क्या चीज़ है, और उसके वो कौन से गुण हैं। जिनके बूते पर वैज्ञानिक इतने विश्वास से हमारे जीवन के हालातों में ऐसे मूलभूत परिवर्तन करने की बात कर रहे हैं, यह अपने-आप में काफी रोचक विषय है। चूंकि अतिचालकता एक पेचीदा और विकसित (advanced) अवधारणा है, इसे बिना कोई पूर्व तैयारी किए समझना शायद कठिन साबित होगा। इसलिए क्यों न हम पदार्थों में विद्युत चालकता और विद्युत प्रतिरोध जैसी मूलभूत अवधारणाओं का पुनरावलोकन करके ही आगे बढ़े?

क्या है करंट
सबसे पहला प्रश्न तो यही उठता है कि करंट क्या है। इस सवाल का जो उत्तर आज सर्वमान्य है वह इसी सदी की देन है। इससे पहले वैज्ञानिक यही मानते थे कि करंट एक भारहीन द्रव है जो पदार्थों से होकर बहता है। नए तथ्यों की खोज हमें प्रायः अपनी समझ में भारी फेर-बदल करने पर विवश कर देती है। ऐसा करंट की अवधारणा के साथ भी हुआ। इस सदी की शुरुआत में इलेक्ट्रॉन नामक सूक्ष्मतम परमाण्विक कणों की खोज से यह साबित हो गया कि धातुओं में बहने वाला करंट कोई भारहीन द्रव नहीं अपितु ऋण आवेशित इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह है। ये इलेक्ट्रॉन बेहद हल्के ज़रूर होते हैं, परंतु भारहीन नहीं।*

अब चित्र-1 (अगले पृष्ठ पर) में दिए सरल परिपथ पर गौर करें। अपने


* एक इलेक्ट्रॉन का भार = 9 1 x 10-11 kg


पूर्वज्ञान के आधार पर हम जानते हैं। कि इस परिपथ में विद्युत धारा प्रवाह बैटरी के कारण ही होता है। यह इसलिए कि बैटरी परिपथ के बिंदु ‘क’ और ‘ख’ के विद्युत विभवों में अंतर पैदा कर देती है।

विद्युत विभवों के अंतर को सामान्य भाषा में 'वोल्टेज' भी कहा जाता है। किसी भी परिपथ में करंट 'वोल्टेज' की मौजूदगी के कारण ही बहता है। विद्युत विभव और वोल्टेज की परिभाषाओं में न उलझाते हुए, यहां यह जानना ही काफी होगा कि बिंदु ‘क’ और ‘ख’ के मध्य वोल्टेज की मौजूदगी आखिर विद्युत धारा का सबब कैसे बनती है। दरअसल होता यह है कि वोल्टेज के कारण परिपथ के तारों और अवयवों में मौजूद इलेक्ट्रॉनों पर एक साथ और एक ही दिशा में विद्युत बल लगने लगता है। यही बल इन इलेक्ट्रॉनों को बैटरी के ऋण ध्रुव से धन ध्रुव की ओर बहने के लिए बाध्य करता है। इलेक्ट्रॉनों के इसी बहाव को हमें करंट कहते हैं।

यहां पर एक सवाल उठता है। आप जानते होंगे कि अगर किसी वस्तु पर एक बाहरी बल लगता रहे तो उसकी चाल निरंतर (भले ही धीरे-धीरे) बढ़ती जानी चाहिए।* लिहाज़ा विद्युत बल के कारण इलेक्ट्रॉनों की धन ध्रुव की दिशा में चाल भी निरंतर बढ़ती जानी चाहिए। अब अगर इलेक्ट्रॉनों की चाल में लगातार वृद्धि हो तो करंट की मात्रा में समानुपाती वृद्धि भी निश्चित ही है। पर हम किसी भी परिपथ में ऐसा होता हुआ नहीं पाते हैं।

अगर वोल्टेज स्थिर रहे तो परिपथ पूर्ण होते ही करंट भी शीघ्र शून्य से एक निश्चित मान पर पहुंच कर स्थिर हो जाता है। आखिर क्यों? उत्तर शायद आप भांप ही गए होंगे। करंट का स्थिर रहना इस बात को दर्शाता है कि


*आम जीवन मे ऐसा देखने को नहीं मिलता, पर इसके लिए घर्षण जैसे अवरोधी बल ज़िम्मेदार हैं।


परिपथ के तारों और अन्य अव्यवों में ज़रूर कोई ऐसा गुण विद्यमान है जो विद्युत बल से प्रभावित इलेक्ट्रॉनों को धन ध्रुव की दिशा में अपनी चाल बढ़ाने से निरंतर रोकता रहता है; करंट को स्थिर रखता है। दूसरे लफ्ज़ों में, हर वह पदार्थ, जिसमें से आप करंट बहाते हैं, करंट के बहने में निरंतर रुकावट डालता है। कोई कम तो कोई ज्यादा। अवरोध के लिए जिम्मेदार, पदार्थों के इस विद्युतीय गुण का एक बड़ा ही स्वाभाविक-सा नाम है - विद्युत प्रतिरोध। किसी चीज़ का विद्युत प्रतिरोध कितना है इसका मापन ओह्म नामक इकाई में किया जाता है।

यानी किसी परिपथ में कुल कितना करंट बहेगा, यह न सिर्फ वोल्टेज पर अपितु परिपथ के कुल विद्युत प्रतिरोध पर भी निर्भर करता है। प्रतिरोध जितना ज्यादा होगा, करंट की मात्रा उतनी ही कम होगी। अगर मिसाल देकर समझा जाए तो किसी पदार्थ से करंट का बहना एक तरह से किसी पाइप में पानी के बहने जैसा ही है। पानी के बहाव की दर पानी के प्रेशर के साथ-साथ पाइप द्वारा बहाव में डाले गए अवरोध पर भी निर्भर करती है; विद्युत धारा की प्रतिरोध पर निर्भरता भी इसी प्रकार की है। पर इस बात से, यह नहीं समझ लेना चाहिए कि पानी के प्रवाह और विद्युत धारा प्रवाह में कोई फर्क नहीं होता। किसी चीज को समझने के लिए मिसालों की उपयोगिता एक हद तक ही होती है। उसके आगे अवधारणाओं को उसी विषयवस्तु के संदर्भ में समझना ही मुनासिब रहता है। इसलिए अगर हम पदार्थों में विद्युत प्रतिरोध की और स्पष्ट समझ हासिल करना चाहते हैं, तो इस गुण को परमाण्विक स्तर पर समझना लाजिमी हो जाता है। चर्चा सहज और सरल रहे इसके लिए फिलहाल हम अपना ध्यान धातुओं में करंट प्रवाह तक ही सीमित रखेंगे

टक्कर और प्रतिरोध
धातुओं में करंट के रूप में बहने वाले इलेक्ट्रॉन, खुद धातुओं के परमाणुओं से ही प्राप्त होते हैं। दरअसल, होता यह है कि धातुओं के परमाणु अपने सभी इलेक्ट्रॉनों को अपने में बांध कर रख नहीं पाते। हरेक परमाणु से एक निश्चित संख्या में कुछ इलेक्ट्रॉन टूट कर पूरे पदार्थ में.स्वतंत्र और बेतरतीब विचरने के लिए आज़ाद हो जाते हैं।” वोल्टेज की मौजूदगी में इन इलेक्ट्रॉनों पर एक खास दिशा में विद्युत बल लगने लगता है। इस बल के कारण इनके स्वतंत्र और बेतरतीब विचरण को अब एक खास दिशा (ऋण


*इन इलेक्ट्रॉनो को चालक इलेक्ट्रॉन भी कहा जाता है।


तालिका 1: प्रतिरोध पदार्थ का एक निहित गुण है। इसकी इकाई ओम है। तालिका में 20°C पर विभिन्न पदार्थों के प्रतिरोध का मान दिखाया गया है।

से धन ध्रुव की ओर) मिल जाती हैपर इस दिशा में इनका बहाव बेरोकटोक नहीं हो पाता क्योंकि इनका रास्ते में पड़ने वाले धातु के परमाणुओं से निरंतर टकराव होता रहता है। क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह टकराव कितनी जल्दी-जल्दी होते होंगे? अगर तांबे की मिसाल दी जाए, तो गणना करने पर दो टकरावों के बीच का अंतराल मात्र 2.5 x 10-11 सेकंड निकलता है। इतनी जल्दी होने वाले निरंतर टकरावों के कारण ही, विद्युत बल की मौजूदगी के बावजूद इलेक्ट्रॉनों के धन ध्रुव की ओर बहाव की गति निरंतर बढ़ नहीं पाती और एक निश्चित औसत मान पर शीघ्र ही पहुंच कर स्थिर हो जाती है। लिहाजा करंट का मान भी स्थिर हो जाता है। बस यही टकराव हैं पदार्थों में विद्युत प्रतिरोध की मौजूदगी का मूल कारण।

किसी भी वस्तु - जैसे कि धातु का तार - का विद्युत प्रतिरोध उसकी आकृति और आकार पर निर्भर करता है। मसलन, एक लंबे तार का विद्युत प्रतिरोध एक छोटे तार के बनिस्बत ज़्यादा होगा। इसलिए अगर हम विभिन्न पदार्थों के विद्युत प्रतिरोधों की तुलना करना चाहें तो यह ज़रूरी हो जाता है कि तुलना करते वक्त सभी पदार्थ एक ही आकार और आकृति के हों। वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक मीटर भुजा वाले घन को मानक माना है। किसी पदार्थ के एक मीटर वाले घन की विपरीत सतहों के मध्य विद्युत प्रतिरोध को उस पदार्थ की प्रतिरोधकता (resistivity) कहा जाता है। और इसका मापन ओह्म मी. इकाइयों में होता है। कोई पदार्थ विद्युत धारा प्रवाह में कितनी रुकावट डालता है इसका पता उसकी प्रतिरोधकता के ज़रिए ही लगता है। तालिका में कुछ पदार्थों की प्रतिरोधकता के मान दिए गए हैं।

कुछ पदार्थों में इलेक्ट्रॉन परमाणुओं से काफी मजबूती से बंधे होते हैं। इनमे प्रतिरोध काफी ज्यादा होता है क्योंकि विद्युत प्रवाह के लिए इलेक्ट्रॉन नही मिल पाते। जैसे कि रबर और कांच।

कुछ पदार्थों में कम प्रतिरोध होने का मतलब है कि इलेक्ट्रॉनो का बंधन ढीला होता है; यानी वोल्टेज लगाने पर धारा का प्रवाह शुरू हो जाता है।

जब पदार्थ अतिचालक बन जाता है तो मारा प्रतिरोध गायब हो जाता है। इस स्थिति में इलेक्ट्रॉन जोडे के रूप में आगे बढ़ते है, उनके बीच टक्कर नही होती और बिल्कुल भी ऊष्मा पैदा नहीं होती

क्या कुचालक, क्या सुचालक
तालिका की एक खासियत जो सबसे ज़्यादा ध्यान आकर्षित करती है, वह है विभिन्न पदार्थों की प्रतिरोधकता में विशाल अंतर। जहां एक ओर चांदी है जिसकी प्रतिरोधकता मात्र 1.62 x 10 ओम मी.; और दूसरे छोर पर है फ्युज़्ड क्वार्टज़ (fused quartz) जो 1016 ओह्म मी. की ज़बरदस्त प्रतिराधकता के कारण विद्युत धारा प्रवाह में सबसे अधिक रुकावट डालता है। पदार्थों के बीच इतना विशाल अंतर किसी और गुण में देखने को नहीं मिलता। जो पदार्थ - जैसे चांदी और तांबा - विद्युत धारा प्रवाह में अधिक अवरोध नहीं डालते, उन्हें सुचालक कहा जाता है।

लगभग सभी धातु सुचालक होती हैं। विद्युत धारा प्रवाह को रोकने वाले पदार्थ कुचालक कहलाए जाते हैं। अधिकतर अधातु कुचालक होते हैं। बीच की प्रतिरोधकता लिए कुछ तत्व, जैसे सिलीकॉन, ऐसे भी होते हैं जो शुद्ध रूप में तो कुचालक होते हैं, पर मात्र एक प्रतिशत की मिलावट होने पर इनकी प्रतिरोधकता लाखों-करोड़ों गुना कम हो जाती है। अतः इन्हें अर्धचालक कहा जाता है। तालिका से यह भी स्पष्ट है कि कम-से-कम विद्युत प्रतिरोध के संदर्भ में सुचालकों और कुचालकों में कोई मूलभूत अंतर नहीं होता। यह इसलिए कि करंट, कम हो या ज्यादा, हरेक पदार्थ से बह सकता है। यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक ज़रूर लगती है। आखिर वो कुचालक कैसा जिसमें से करंट बह सके। दरअसल कुचालकों और सुचालकों की प्रतिरोधकताओं में विशाल अंतर के कारण आम वोल्टेजों (मसलन 220 वोल्ट) पर किसी कुचालक से बहने वाला करंट इतना क्षीण होता है कि आप क्या, साधारण उपकरण भी उसे महसूस नहीं कर पाते हैं। और जो करंट महसूस ही न किया जा सके उसका होना या न होना, कम-से-कम हमारे लिए, तो बराबर ही है। इसलिए एक आम धारणा बन जाती है कि कुचालकों से करंट तनिक भी नहीं बह पाता, जो सही नहीं है।

कोई पदार्थ कुचालक है या सुचालक इस बात से तय होता है कि विद्युत धारा प्रवाह के लिए कितने आवेशित कण (मुख्यतः इलेक्ट्रॉन) उपलब्ध हो पाते हैं। और इन कणों की उपलब्धता पदार्थ के परमाणुओं के आपसी बंधन की मजबूती और परमाणुओं के अपने इलेक्ट्रॉनों को अपने से बांधे रखने की क्षमता से निर्धारित होती है। मसलन, जैसा कि हम जिक्र कर चुके हैं धातुओं के परमाणु अपने सभी इलेक्ट्रॉनों को अपने से बांधे नहीं रख पाते हैं। फलस्वरूप धातुओं में करंट प्रवाह के लिए इलेक्ट्रॉन बहुतायत में उपलब्ध रहते हैं। वहीं दूसरी ओर कुचालकों में मौजूद प्रायः सभी इलेक्ट्रॉन अपने अपने परमाणुओं से बंधे रहते हैं। नतीजतन धारा प्रवाह के लिए कम इलेक्ट्रॉन ही जुट पाते हैं और पदार्थ कुचालक कहलाने का पूरा हकदार हो जाता है।

अब तक आप शायद अधीर हो चुके होंगे, क्योंकि हमारी बात अभी तक अतिचालकता पर पहुंच नहीं पाई है। बस थोड़ा-सा धीरज और रखें, और चलते-चलते विद्युत प्रतिरोध की तापमान पर निर्भरता को भी समझते चलें। यह जरूरी है क्योंकि अतिचालकता की पूरी कहानी प्रतिरोधकता के इसी पहलू पर केन्द्रित है।

पदार्थों की प्रतिरोधकता उनके तापमान पर निर्भर पाई जाती है। अधिकांश सुचालकों का विद्युत प्रतिरोध तापमान बढ़ाने पर बढ़ जाता है और तापमान घटाने पर उसी अनुपात में घट भी जाता है (देखें चित्रः3)। इस किस्म की निर्भरता की वजह है तापमान में परिवर्तन का सुचालकों के परमाणुओं पर प्रभाव। तापमान के बढ़ने से परमाणुओं का अपनी जगहों पर कंपन बढ़ जाता है। अब ज़ाहिर है कि परमाणु जितने ज्यादा कांपेंगे, अपनी जगह से जितना अधिक हिलेंगे-डुलेंगे, चालक इलेक्ट्रॉनों से उनके टकराव की संभावना उतनी ही अधिक हो जाएगी। परिणाम स्वरूप विद्युत प्रतिरोध भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है।

तापमान का कुचालकों की प्रतिरोधकता पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। हां, अर्धचालकों के साथ ज़रूर एकदम उल्टा होने लगता है, उनकी प्रतिरोधकता तापमान बढ़ाने पर तेजी से घटने लगती है। अब हम आते हैं अतिचालकता पर।

जब प्रतिरोध गायब हो गया
सन 1911 की बात है, डच भौतिक शास्त्री के. ओन्स अत्याधिक कम तापमानों पर धातुओं की विद्युत धारा प्रवाह की क्षमता पर शोध करने

चित्र-5: "K तापमान पर पारे की प्रतिरोधकता गिरकर शून्य हो जाती है। इस तापमान पर पारा ठोस होता है।

में रमे हुए थे। एक दिन उन्होंने पारे को जमाया और निरंतर घटते तापमानों पर उसके विद्युत प्रतिरोध का मापन करने में जुट गए। वे जानते थे कि तापमान घटाने पर विद्युत प्रतिरोध कम हो जाता है, और उनका प्रयोग भी इसी बात की गवाही दे रहा था। 10 डिग्री केल्विन (यानी -263 डिग्री सेल्सियस) पर पारे का विद्युत प्रतिरोध घट कर सामान्य तापमान (यानी करीब 23 डिग्री से.) पर प्रतिरोध का सौवां हिस्सा रह गया था। उन्होंने धीरे-धीरे तापमान और घटाया। तापमान जैसे ही 4.2 डिग्री केल्विन पर पहुंचा, एक अभूतपूर्व घटना घटी जिसने उन्हें हतप्रभ कर दिया। उन्होंने पाया की पारे का विद्युत प्रतिरोध थोड़ा और कम होने के बजाए अचानक एकदम गायब हो गया था (देखें चित्र-5)। अब ठोस पारे से करंटे बिना कोई विद्युत प्रतिरोध का सामना किए बेरोकटोक बह रहा था। इस चमत्कारी क्रिया को उन्होने नाम दिया अतिचालकता। उन्होंने अन्य धातु और मिश्र धातुओं पर यही प्रयोग दोहराया और पाया कि कुछ और धातुएं और मिश्र धातुएं भी भिन्न भिन्न तापमानों के नीचे इस गुण का प्रदर्शन करने लगती हैं। वह तापमान जिस पर पहुंचते ही कोई पदार्थ अतिचालक बन जाता है, उसका ‘अतिचालक संक्रमण तापमान' (Su per Conductive Transition Tempera ture) कहलाता है। कमाल की बात यह है कि इस तापमान पर पहुंचने पर पदार्थ के गुणों में एकदम अचानक मूलभूत परिवर्तन होते हैं। अगर कोई अतिचालक पदार्थ अपने ‘अतिचालक संक्रमण तापमान पर है तो तापमान में एक डिग्री के हज़ारवें अंश की वृद्धि भी अतिचालक को एकदम सामान्य और विद्युत प्रतिरोध से युक्त सुचालक बना देगी। इस तरह के परिवर्तन अवस्था परिवर्तन (Phase Transition) कहलाते हैं। पानी का भाप में बदलना, बर्फ का पानी बनना भी अलग-अलग किस्म के अवस्था परिवर्तन ही हैं।

जब इलेक्ट्रॉन जोड़े में बहते हैं  
‘के. ओन्स' के समय अतिचालकता एक अनोखा रहस्य था। यह रहस्य तकरीबन 46 सालों तक बरकरार रहा। बारडीन, कूपर और शिफर के संयुक्त प्रयासों से 1957 में जन्मे बीसीएस सिद्धांत (BCS Theory) के ज़रिए ही अंततः वैज्ञानिक इस गुत्थी को सुलझा पाए। इस सिद्धांत को क्वांटम यांत्रिकी की मदद के बिना समझाना कठिन है, पर एक मोटे स्तर पर समझा जाए तो इस सिद्धांत के अनुसार ‘अतिचालकता संक्रमण तापमान पर पहुंचते ही पदार्थ के इलेक्ट्रॉन अकेले बहने के बजाय दो दो की जोड़ियों में बहना शुरू कर देते हैं। अतिचालकता को पूरा कमाल इसी बात पर आधारित है क्योंकि जोड़ियों में बहते ही इलेक्ट्रॉनों के पदार्थ के परमाणुओं से टकराव बंद हो जाते हैं। उलटे ये परमाणु भी इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह में मदद करने लगते हैं। अब जब मर्ज़ ही दवा बन जाए तो परेशानी कैसी। लिहाज़ा विद्युत प्रतिरोध गायब हो जाता है और पदार्थ सुचालक से अतिचालक बन जाता है। क्वांटम यांत्रिकी की मदद के बिना इस गुण को और गहराई से समझना तो कठिन होगा, पर यह ज़रूर स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि चालकता और अतिचालकता बुनियादी तौर पर भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएं हैं।

सुचालकों और अतिचालकों में करंट एकदम अलग-अलग ढंग से बहता है। इसलिए अतिचालकता को महज़ चालकता में एक ज़बरदस्त सुधार बतौर देखना सही नहीं होगा। मिसाल के तौर पर, चांदी और तांबा सबसे अच्छे सुचालक माने जाते हैं। आप उम्मीद करेंगे कि ‘अतिचालक संक्रमण तापमान के नीचे ये उतने ही अच्छे अतिचालक साबित होंगे। पर ऐसा नहीं होता। वैज्ञानिक इन दोनों सुचालकों को अतिचालक बनाने में असफल रहे हैं। वहीं दूसरी ओर सिरेमिक (Ceramic) पदार्थ जो सामान्य तापमान पर कुचालक होते हैं, कम तापमान पर सबसे अच्छे अतिचालक साबित होते हैं। है न कमाल की बात। दरअसल, दुनिया के बारे में हमारी सामान्य समझ उन्हीं परिस्थितियों के संदर्भ में विकसित हुई है जिनमें हम अपना जीवन व्यतीत करते हैं। इन हालातों में जब भी भारी फेरबदल होती है, तो प्रकृति अक्सर अप्रत्याशित और अनोखे रूप धारण कर लेती है। ऐसे रूप जिन्हें समझने के लिए हमारी समझ अपर्याप्त और अक्सर गलत साबित होती है।

अपने निराले गुणों के कारण अतिचालक के उपयोग की कई ज़बरदस्त संभावनाएं वैज्ञानिकों को नजर आती हैं। इनमें से कई तो फिलहाल मात्र विचारों के रूप में हैं; और कुछ वास्तविकताओं में बदल कर हमारे उपयोग में आने लगी हैं। इससे पहले कि अतिचालकता पर आधारित तकनीक और उपकरण एक बड़े पैमाने पर हमारे जीवन में प्रवेश करें, वैज्ञानिकों को कुछ चुनौतियों से निपटना पड़ेगा। इनमें सबसे बड़ी चुनौती है।

1911 मे 1991 तक का सफर - विभिन्न पदार्थों में हासिल उच्चतम अतिचालक क्रांतिक तापमान का ग्राफ

तापमान की। अतिचालकता बहुत ही कम तापमान पर उजागर होती है (देखें तालिका)। पदार्थों को उनके ‘अतिचालक संक्रमण तापमान' से नीचे के तापमान तक पहुंचाना और उस तापमान पर बरकरार रखना बड़ा ही महंगा और कठिन साबित होता है। इसलिए शुरू से ही अतिचालकता के शोधकर्ताओं में आपस में होड़ लगी रही है कि कौन सबसे अधिक ‘अतिचालक संक्रमण तापमान' वाला पदार्थ खोज निकाले। इस स्पर्धा की शुरुआत 1911 में 4.2 डिग्री केल्विन संक्रमण तापमान वाले पारे से हुई थी। और आज आलम यह है कि वैज्ञानिकों ने ऐसे यौगिक (बिसमथ और थैलियम ऑक्साइड) खोज निकाले हैं जो 125°K (यानी -148°C) के अपेक्षाकृत 'गरम' तापमान पर ही अतिचालक बन जाते हैं। यह दौड़ जारी है और अब वैज्ञानिक ऐसे पदार्थों की खोज में जुटे हैं जो सामान्य तापमानों (20-22°C) पर भी अतिचालक बने रहें। जिस दिन यह संभव हो गया, मुमकिन है उस दिन से एक नए युग की शुरुआत हो।

आज और भविष्य में भी अतिचालकता का प्रमुखतम उपयोग संभवतः अतिशक्तिशाली विद्युत-चुबंक

*टेसला चुंबकीय बल क्षेत्र के मापन की इकाई है। तुलना के लिए शायद यह जानना सार्थक होगा। कि पृथ्वी का चुंबकीय बल क्षेत्र लगभग 10 टेसला है।

बनाने में हो सकेगा। साधारण विद्युत चुंबक तांबे के तार को लोहे की छड़ (या छल्ले) के ऊपर कुंडली लपेटकर बनाए जाते हैं। आमतौर पर इनकी उपयोग 1.5 टेसला* (Tesla) तक के चुंबकीय बल क्षेत्र पैदा करने में किया जाता है। साधारण विद्युत-चुंबकों से इससे ज्यादा शक्तिशाली चुबकीय बल क्षेत्र स्थापित करने में दो तरह की दिक्कतें आती हैं। पहली यह कि तांबे के तारों में विद्युत-प्रतिरोध के कारण विद्युत ऊर्जा का एक भाग ऊष्मा, यानी गर्मी, में बदल कर अनुपयोगी हो जाता है। अगर हम शक्तिशाली विद्युत-चुंबक बनाने के चक्कर में करंट की मात्रा बढ़ा देते हैं तो ऊर्जा का नुकसान तो बढ़ता ही है, साथ ही ज्यादा गर्मी पैदा होने के कारण तारों के पिघलने और विद्युत-चुंबक के नष्ट होने का खतरा भी रहता है। सामान्य तौर पर शक्तिशाली विद्युत-चुंबकों को निरंतर ठंडा करने की व्यवस्था होती है। पर यह सब इंतजाम काफी मंहगा पड़ जाता है।

अति चालकता से निर्मित विद्युत चुंबकों में इस तरह की परेशानियों का सवाल ही नहीं उठता। प्रतिरोध शून्य होने के कारण न तो विद्युत ऊर्जा का कोई नुकसान होता है और न ही तारों के तनिक भी गर्म होने का कोई खतरा। लिहाज़ा ढेर सारा करंट बहा कर अतिशक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों का सृजन किया जा सकता है।

अतिशक्तिशाली विद्युत-चुंबकों के ढेर सारे उपयोग सोचे जा सकते हैं। इनमें शायद सबसे ज्यादा प्रचारित उपयोग होगा हवा में तैरती हुई ट्रेनों का विकास। यह ट्रेनें अभी भी परीक्षण अवस्था में हैं क्योंकि वैज्ञानिक उच्च ताप (कम से कम द्रवीय नाइट्रोजन के तापमान यानी लगभग 78 डिग्री केल्विन) पर अतिचालक बने रहने वाले ऐसे पदार्थ नहीं खोज पाए हैं जो आसानी से बनाए जा सकें, जिन्हें मजबूत तारों में सुगमता से ढाला जा सके और जिनकी अतिचालकता आसानी से नष्ट न हो।

ऐसी संभावना है कि भविष्य में अतिचालक विद्युत-चुंबकों की मदद से आकार में बेहद छोटी, परंतु शक्तिशाली और कुशल विद्युत मोटरों का निर्माण हो सकेगा। इन मोटरों की वजह से संभव है कि भविष्य में पेट्रोल डीजल से चलने वाली गाड़ियों के दिन लद जाएं और उनकी जगह अतिचालक विद्युत मोटर आधारित शक्तिशाली, शांत और प्रदूषणरहित गाड़ियां ले लें।

अतिचालकता का दूसरा प्रमुख उपयोग संभवतः विद्युत ऊर्जा संग्रह और स्थानांतरण में होगा। साधारण परिपथों में करंट को बरकरार रखने के लिए वोल्टेज का होना जरूरी होता है। यह इसलिए कि विद्युत ऊर्जा को कुछ भाग विद्युत प्रतिरोध की वजह से निरंतर ऊष्मा में बदलता रहता है। इसके विपरीत अतिचालक परिपथों में अगर एक बार करंट बहना चालू हो जाए तो फिर बिना वोल्टेज के और बिना घटे, चिरकाल तक बहता रहता है। यानी परिपथ की विद्युत ऊर्जा संग्रहित रहती है। वाशिंगटन, अमेरिका में मौजूद एक विशाल अतिचालक परिपथ का उपयोग विद्यत ऊर्जा को संग्रहित करने के लिए किया जाता है। इस परिपथ में पांच मेगावॉट तक की विद्युत ऊर्जा संग्रह की जा सकती है, जिसका जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल कर लिया जाता है।

अति चालकों के कम्प्युटरों में उपयोग की भी संभावनाए हैं। कई प्रयोगशालाओं में आज वैज्ञानिक ऐसे तरीकों को ईजाद करने में जुटे हैं। जिनके ज़रिए केवल सौ-एक परमाणुओं जितनी मोटाई की अत्यन्त पतली अतिचालक परतों को ‘कम्पयूटर चिप' पर जमाया जा सके। ऐसी चिप की मदद से भविष्य में और छोटे, किंतु शक्तिशाली कम्प्यूटर बनाना संभव हो सकेगा। अतिचालकता की मदद से शक्तिशाली चुंबक तो बनाए जा सकते ही हैं; पर आपको यह जानकर शायद अचरज हो कि कई प्रयोगशालाओं में अतिचालकों का उपयोग अत्यंत क्षीण चुंबकीय बलों को नापने में भी किया जाता है।

इसके अलावा बड़ी प्रयोगशालाओं में आजकल अति चालकता आधारित उपकरणों का उपयोग नाभिकीय शोध में भी खूब हो रहा है।

सस्ते, आसानी से बनने वाले, मजबूत और उच्च ताप वाले अति चालकों को खोजने की दौड़ में कई भारतीय शोध संस्थान भी जोर-शोर से शामिल हैं, जैसे राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशालाएं, टाटा मूलभूत शोध संस्थान और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज़ आदि। शायद हम हिन्दुस्तानी ही यह बाजी मार ले जाएं। आमीन।


अजय शर्मा: एकलव्य के होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम से संबद्ध।

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